
सूरजपुर कौशलेन्द्र यादव । धान खरीदी घोटाले को लेकर उठ रहे सवालों के बीच प्रशासन ने आखिरकार औचक निरीक्षण को लेकर प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी, लेकिन यह विज्ञप्ति खुद कई नए सवालों को जन्म दे रही है। राजस्व, खाद्य विभाग एवं मंडी की संयुक्त टीम द्वारा जिले के चार धान उपार्जन केंद्रों में किए गए निरीक्षण में 52 हजार से अधिक बोरी धान की भारी कमी सामने आई है, इसके बावजूद संबंधित केंद्रों के प्रबंधक अब भी धान खरीदी व्यवस्था में बने हुए हैं।
*प्रशासन की ओर से जारी जानकारी के अनुसार—*
सावारांवा उपार्जन केंद्र में 6,470 बोरी धान (लगभग 2,588 क्विंटल) कम पाया गया।
टुकुडांड उपार्जन केंद्र में 16,032 बोरी धान (लगभग 6,412 क्विंटल) गायब मिली।
शिवप्रसाद नगर उपार्जन केंद्र में 13,880 बोरी धान (लगभग 5,552 क्विंटल) की कमी पाई गई। सूरजपुर उपार्जन केंद्र में 16,526 बोरी धान (लगभग 6,610 क्विंटल) कम पाया गया।
यानि चार केंद्रों में कुल मिलाकर 52,900 से अधिक बोरी धान का अभाव, जो सीधे-सीधे करोड़ों रुपये के घोटाले की ओर इशारा करता है।
*कार्रवाई के नाम पर सिर्फ “प्रकरण तय”?*
प्रेस विज्ञप्ति में यह जरूर कहा गया है कि “धान उपार्जन नीति के तहत आवश्यक कार्यवाही की जाएगी”, लेकिन अब तक न तो किसी प्रबंधक को हटाया गया है, न निलंबन की सूचना दी गई है और न ही एफआईआर की पुष्टि हुई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि—
👉 जब गड़बड़ी इतनी बड़ी है,
👉 जब कमी लिखित रूप में सामने आ चुकी है,
👉 जब प्रशासन खुद आंकड़े स्वीकार कर रहा है,
तो फिर जिन प्रबंधकों के कार्यकाल में यह घोटाला हुआ, वे अब भी उसी सिस्टम का हिस्सा क्यों हैं?
*क्या सबूत मिटाने का समय दिया जा रहा है?*
जानकारों का कहना है कि जब तक आरोपी प्रबंधक पद पर बने रहते हैं, तब तक—
रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की आशंका बनी रहती है,
जिम्मेदारी तय करने में देरी होती है,
और पूरे मामले को कमजोर करने का अवसर मिलता है।
ऐसे में प्रशासन की यह ढिलाई कार्रवाई पर नहीं, संरक्षण पर सवाल खड़े करती है।
*शिवप्रसादनगर मामला पहले से जांच में, फिर भी वही हाल*
गौरतलब है कि शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में पहले ही हजारों बोरी धान गायब होने का मामला सामने आ चुका था। जांच पूरी होने और कमी स्वीकार किए जाने के बावजूद वहां भी प्रबंधक को हटाने की कोई जानकारी सामने नहीं आई, जिससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि कहीं यह सब “औपचारिक कार्रवाई” तक ही सीमित न रह जाए।
*जनता के सीधे सवाल, प्रशासन के पास जवाब कब?*
अब जिले की जनता और किसान संगठनों के सामने सवाल बिल्कुल साफ हैं—
क्या इस घोटाले पर एफआईआर दर्ज होगी या नहीं?
क्या गबन की गई धान की वसूली जिम्मेदारों से होगी?
क्या प्रबंधकों को पद से हटाकर निष्पक्ष जांच कराई जाएगी?
या फिर यह मामला भी “प्रकरण तय” की फाइल में दबा दिया जाएगा?
*पारदर्शिता नहीं तो संदेह और गहराएगा*
प्रशासन की प्रेस विज्ञप्ति से यह तो साफ हो गया है कि घोटाला हुआ है, लेकिन जब तक—
दोषियों के नाम सार्वजनिक नहीं होते,
ठोस दंडात्मक कार्रवाई नजर नहीं आती,
और प्रबंधकों को जिम्मेदारी से अलग नहीं किया जाता,
तब तक यह सवाल बना रहेगा कि
“जांच हुई, गड़बड़ी साबित… फिर कार्रवाई पर सन्नाटा क्यों?”
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